डॉ बाबासाहब आम्बेडकर इनका पत्रकारिता पे नजरिया शुद्ध पॉलिटिकल था - ज्योती खोब्रागडे
महाकारुनिक तथागत गौतम बुद्ध और आधुनिक बुद्धा डॉ बाबासाहब आम्बेडकर जी के पावन स्मृति को प्रथम अभिवादन करती हु l इंडियन अलायंस मुव्हमेंट द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम के अध्यक्ष रवि डम्भारे, इस कार्यक्रम में मेरे साथ आमंत्रित किये गये नागपुर समाचार 24 के अमित वांद्रे, व्ही 24 तास मिडियाके वैभव काम्बले, आयएऍम के राष्ट्रिय संघटक शुभम डहाट इनके उपस्थिति में आज का ये वैचारिक प्रोग्राम होने जा रहा है| “पत्रकारीतासंबंधी बाबासाहब आम्बेडकर इनका नजरिया” इस विषय पे मुझे आज मेरे विचार रखने है|
जैसे की आप सब जानते है बाबासाहबने सार्वजनिक जीवन में कदम रखा तो परिस्थिति कितनी भयावह थी| सामाजिक, राजनैतिक, शिक्षा, धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक इस सभी तरफ पिछड़ापन था| बहिष्कृतोंनके लिए राजनीती तो बहोत दूर थी | क्यूंकि उनका कोई वजूदही नही था | जानवरों की थी मगर बहिश्क्रुतों की कोई कीमत न थी | इंसानियत तो उनसे कोसो मिल दूर थी | तीनो वर्णों के लोगो में उनके प्रति सन्मान तो छोडिये दया, करुणा नाम की कोई चीज उनके हिस्से में नही आती थी| आती तो सिर्फ घृणा, द्वेष, हिंसा, अपमान. ये परिस्थिति तब बदली जब अंग्रेज, ब्रिटिश लोग यहा पर धंदा करने के मतलब से आये. उन्होंने अपने साथ मानव उन्नति की बहोत सी चीजे भी लायी | भारत में ब्रिटिश आने से उनके साथ विज्ञान, कला, कानून और अलग अलग किसम की फैकल्टी आ गयी. उनकी मुद्रण कला भी साथ आई| उसकी वजह से शिक्षा आयी, लोगों में पढ़ने लिखने की और दुनिया की जानकारी इक्ठटा करने की होड़ लग गयी | उसके साथ विचार व्यक्त करना लोगोंने जरुरी समझा. इसलिए छपाई का ज्ञान भी साझा होने लगा | उस जमाने में समाचार पत्र थोडा मुश्किल काम था | पत्रिकाए याने “A publication put out at regular intervals greater than a day, as a weekly, monthly, quarterly”. Western people call it Fourth estate of the kingdom. इतना ये महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है|
मराठी पत्रिका की शुरुवात बालशाश्त्री जाम्भेकर इन्होने ६ जनवरी १८३२ में “ दर्पण ” के रूप में की. बहिश्क्रुतोंकी पत्रिका शुरू होने के लिए ७५ साल लगे. बहिश्क्रुतों के लिए पेहली पत्रिका “सोमवंशीय मित्र” की शुरुवात शिवराम जानबा काम्बले जी ने की| दूसरा प्रयत्न नागपुर में किसण फागुजी बनसोडेजीने “ निराश्रित हिन्द नागरिक ” के रूप में की | १९२० के बाद बहिश्क्रुतोंकी अनेक पत्रिकाए छपने लगी. इस साल का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न मूकनायक के रूप में बाबासाहब ने किया | तब तक बाबासाहबने बहोत सार्री डिग्रिया हासिल कर च्युके थे | मै ये इसलिए बता रही हु ताकि पत्रिका शुरू करने के पहले बाबासाहब की सोच किस कदर गहरी, परिपक्क हो चुकी थी और दुनिया के बुद्धिमान लोगों में वो किस कदर अपना स्थान बना चुके थे | क्या करना, कैसे करना, कब करना, पहले क्या और बादमे क्या करना पूरी स्ट्रेटेजी बाबासाहब के दिमाख में फिट थी | उसका उन्होंने अपने लोगों उत्थान में बखूबी इस्तमाल किया | समाज में सांस्कृतिक वर्चस्व जिस वर्ग का होता है उसी वर्ग का प्रतिबिम्ब हमें साहित्य, समाचारपत्र, पत्रिकाओं में दिखाई देता है| शोषक याने बहिष्कृत वर्ग के हिस्से में उतना जादा दुःख, दर्द और सभी तरह की कठिनाइया थी ऐसे में बाबासाहब जैसा दूरदृष्टी रखनेवाला नेता पत्रकारितासे भला अछूता कैसे रह सकता था?
बाबासाहब का पत्रकारिता के ऊपर मैंने जितना भी साहित्य पढ़ा है उससे मुझे लागता है की बाबासाहब का पत्रकारितासंबंधी नजरिया शुद्ध पोलिटिकल था| मुकनायक शुरू करने के पहले ही उन्होंने राजकीय डावपेच का आगाज किया था |
१९१३ से १९१७ तक बाबासाहब एम.ए पिएच.डी. की पढाई के लिए बड़ोदा के महाराज सयाजीराव गायकवाड से मदत लेकर न्युयोर्क गये थे| वहासे लोटने के बाद १० साल तक उन्हें उनके पास नोकरी करनी थी लेकिन जातिवाद के कटु अनुभव ने उनका पीछा नही छोड़ा | पढ़े लिखे इन्सान की ये हालत है तो दबा कुचला मेरा समाज क्या झेलता होगा ये बात वो कभी नहीं भूलते थे| और नाही लोग उन्हें भूलने देते थे| प्रथम महायुद्ध के बाद ब्रिटिश सरकार की खस्ता हालत थी | भारत में स्वतंत्रता आन्दोलन भी तेजी पकड़ रहा था| इसलिए ब्रिटिश पार्लमेंट में २० अगस्त १९१७ में भारत में जिम्मेदार सरकार निर्माण करनेकी हेतु से क्रमशः सत्ता हस्तान्तरन करने की घोषणा कर दी गयी थी | शायद बाबासाहेब सोचते थे ब्रिटिश है तब तक समाज के लिए कुछ हो सकता है. अगर वो चले गये और सत्ता वरिष्ठ वर्ग के हात चली गयी तो संघर्ष मुश्किल हो जायेगा. दूसरी बात नोकरी में फस गया तो जादा कुछ हासिल न हो सकेगा इसलिय पुरे जोरशोर से हमारे आजादी की लड़ाई में उतरना होगा|
बाबासाहेबने २७ जनवरी १९१९ वोट राईट (मताधिकार)पे साऊथ ब्यूरो समिति के सामने गवाई दे दी | उन्होंने उनके निवेदन में स्पष्ट किया सरकार अगर लोकप्रतिनिधी का होंगे तो बहिश्क्रुतों को उनके जनसँख्या के आधार पर प्रतिनिधित्त्व देना आवश्यक है |उसका सविस्तर विवेचन देकर बहिश्क्रुतोंको नौ जगह देने की मांग उन्होंने उस समय की थी |
जातीयवाद हजारो सालोसे शुरू है | लेकिन उसका राजनीतिकरण करके बाबासाहबने रास्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी भीषणता सामने लायी | एक तरफ लोग शिक्षा हासिल कर अपने अधिकार के प्रति जागरूक हो रहे थे । दक्षिण महाराष्ट्र के बहिष्कृत वर्ग की परिषद् कोल्हापुर जिले में मानगाव में २१/२२ मार्च सन १९२० में बाबासाहब के अध्यक्षता में आयोजीत कि गई | इसमें कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज भी उपस्थित थे| अध्यक्षीय भाषण में बाबासाहब ने कहा “ आपण राजकीय सामर्थ्य सम्पदिले पाहिजे. जातवार प्रतिनिधी मिलाल्याशिवाय आपल्या हाती राजकीय सामर्थ्य येणार नाही”.
कोई भी नया विचार, तत्त्व या कानून समाज में एकदम से स्वीकार नही होता. उसके पहले समाज की मानसिकता बनानी पड़ती है| और बाबासाहब का मकसद तो दबे, कुचले लोगोंको इंसानियत बहाल करना था! हजारो सालोंसे उनपर हो रहे अन्याय, अत्याचार के खिलाप लोगोंको उकसाकर वे इस जातीयवादी व्यवस्था के गुलाम है ये अहसास दिलाना था |
३१ जनवरी १९२० में उन्होंने मूकनायक की शुरुवात की. तब वे सिडनेहैम कॉलेज में सरकारी नोकरी में थे | इसलिए संपादक नही रह सकते थे | मूकनायक के शुरू के अंको में बाबासाहब खुद अग्रलेख लिखते थे | पेहले अग्रलेख में बाबासाहब लिखते है, जातिभेद आणि जातिमत्सर यांनी ग्रस्त झालेल्या देशात खरे स्वराज्य नांद्न्यास या बहिष्कृत वर्गास त्यांच्या स्वतंत्र प्रतिनिधिंतर्फे राजकीय सत्तेचा पुरेसा भाग मिलावा.
मूकनायक की नीव रखकर छे महीने बाद वे आगे की पढाई के लिए विलायत याने लंदन चले गये. इधर मूकनायक को भटकर और दुसरे संपादक घोलप अच्छी तरह से संभाल नहीं पाए और उसे बंद करना पड़ा| जिसका दुःख बाबासाहब ने “बहिश्क्रुत भारत” के प्रथम अंक में व्यक्त किया |
बाबासाहब १९२७ के शुरुवात में मुंबई विधान मंडल के सभासद के रूप में नियुक्त कर दिए गये. शैक्षणिक, सामाजिक, राजकीय ऐसे तीनो फ्रंट पे बाबासाहब के काम शुरू था| उसका आगाज महाड के सत्त्याग्रह से करने का उन्होंने सोचा.
तत्कालीन समाचार पत्र और पत्रिकाओंकी भूमिका हमेशा बहिष्कृत लोगोंके विरुद्ध रही है | उसी समाज से आनेवाले बाबासाहब आम्बेडकर जी का स्वागत वो कैसे करेगी | उनपर टिकाटिपणी भी बहोत होती थी लेकिन उनका मत लेना जरुरी नही समझा जाता था | जो पत्रकारिता के एथिक्स के खिलाफ था. बहिष्कृत लोगोंकी मूवमेंट को भी मजबूत करने के लिए उन्हें पत्रकारिता की जरुरत महसूस होने लगी| बहिष्कृत भारत का पहला अंक ३ अप्रैल १९२७ को प्रकाशित हुआ | एक तरफ महाड सत्याग्रह की मूवमेंट और दूसरी ओर बहिष्कृत भारत में उसका पोस्ट मार्टम इस अंदाज से बाबासाहब करते थे की सामनेवाला उनकी बातोसे की लंबा हो जाता था.
युद्ध में ही शत्रू आमने सामने होता है ऐसा नही, कई बार हमारे सामने, हमारे साथ होता है | हमारा शत्रू तो बहोत पुराना है, चार वर्णोंकी जान से भी जादा रखवाली करनेवाला, शिक्षा के सभी अवसर अपने तक रखनेवाला, उसके निपटने के लिए बाबासाहबको पत्रकारिता का माध्यम जरूरी समझा, शत्रू का एक भी वार वो जाया नहीं होने देते थे |
बाबासाहब की पत्रकारिता पढ़ना एक अलग अनुभव है | इनकी पत्रकारितामें एक ही समय अनेक रसोंका अनुभव मिलता है | राग, साहस हमारे अन्दर उत्पन्न होता है | बदन, आखे भी साथ देती है | हममे उतना जोश भर देती है की बाबासाहब को शरण जाने के सिवा कोई और सोच मन में आती ही नहीं
उस समय “भाला”कार भोपटकरने धमकी दी थी | देवळत जाण्याचा प्रयत्न केल्यास अस्प्रुश्यांच्या पाठी सडकु, उसपर बाबासाहबने बहिष्कृत भारत में लिखा “आमच्या पाठी सडकन्याची धमकी देनार्यांची तालकी शेकू”. आज भी उनकी पत्रकारिता पर किताबे पढ़ने से जो लाइव फिल होता है |
सातारा जिला महार परिषदने १९२६ में कोरेगाव में अधिवेशन का आयोजन किया था| उसमे बाबासाहब बोले “बहिश्क्रुतोंके हातों में जैसे जैसे सत्ता और संपत्ति आयेगी वेसे वेसे उनकी प्रगति हो जाएगी. अंमलदार होना ये प्रगति का लक्षण है. लेकिन जो लोग तुम्हे ये मत करो ऐसा बोलते है वे तुम्हारा बुद्धिभेद करते है ” आज भी बाबासाहब ये शब्द सच लगते है | इसका अनुभव हम आज भी लेते है | खुद हमे राजनीती में न जाने की या उससे दूर रहने की नसीहत दी जाती है | जो समाज ऐसा बोलता है वही समाज आज सत्ता में है | आर्थिक परिस्थिति से जो लोग उभर कर आये है उसमे से बहोत से लोग आज मूवमेंट, राजनैतिक क्षेत्र से अलग रहने की सिर्फ कोशिश ही नही बल्कि बड़े गर्व से बोलते है, मुझे राजनीती पसंद नही | इस बात पे मुझे बड़ी हसी अति है | ऐसा लगता है बाबासाहाब को उन्होंने ठीक से समझा नही. बाबासाहबने उनकी पत्रकारिता, मुव्हमेंट, भाषानोसे और उनके कामोसे हमे बार बार ये सन्देश देते आये है की तुम शासनकरती जमात बनो. संसद की तरफ उनका अंगुलिनिर्देश करना बहोत ही महत्त्वपूर्ण संकेत है, लेकिन हम अभी भी नही सुधरते.
और उन्होंने मूकनायक, बहिष्कृत भारत, समता, जनता (२४ नोव्हेंबर १९३०) जैसे पत्रिकाओंका निर्माण करके ये सत्ता के लिए उचित साधन है। उसका इस्तेमाल जरूरी समझा भैयासाहब आम्बेडकरने बादमे जनता का नामकरण प्रबुद्ध भारत किया. बाबासाहाब ने पत्रिकाए शुरू की. और उनके माध्यमसे उन्होंने राजकीय संघर्षरत रहकर देश को आगे बढ़ाने का साधन हमारे हात दिया है।
१९२० से १९५० तक महाराष्ट्र बहिष्कृत समाज को बाबासाहब जैसे महापंडित का नेतृत्त्व मिलना ये बहोत बड़ी बात है| इस बात के लिए हमारी आगे की पीढ़िया भी शुक्रगुजार रहेगी|